वनस्पति पशुवर्ग

पठार पर पहाड़ियां ज्यादातर डोलराइट डाइक्स का हिस्सा बनाती हैं जो पूरे पठार में आड़ी- तिरछी चलती जाती हैं। वे बहुत नीचीऔर श्रृंखला में हैं। इनकी शीर्ष शिलाओ पर यह उजागर होता है। पतली मिट्टी में मुख्य रूप से कुछ दरारोभिद्( प्रायः चट्टानों की दरारों में पाये जाने वाले पौधे), झाड़ और झाड़ियों हैं|

केंद्रीय पठार के किनारों वाली पहाड़ियां ग्रेनाइटिक प्रकृति की, नीची और कुछ छोटे पेड़ों से ढकी हुई हैं या पूरी तरह से अनुपजाऊ हैं| यहाँ लैंटाना और अन्य विदेशी खरपतवार देखे जाते हैं। जंगली पहाड़ियों पर साल या पर्णपाती प्रजातियों या बांस के मिश्रित जंगल दिखते हैं।

ऐसी सभी भूमि जो कस्बों और गांवों से बहुत दूर हैं या चराई और काटने से बची हुई हैं, वहां शरीफा या सीताफल (कस्टर्ड ऐपल, वानस्पतिक नाम- अन्नोना स्क्वामोसा) , यूजेनिया प्रजातियां, पाम, विकंकला(विकंकर, व्यघ्रापादी)और पलाश (पलास,छूल,परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू) के वृक्ष हैं, जो अंततः इसे एक अग्रणी मानसून जंगल बनाते हैं। ज्यादातर सड़कों और रेलवे लाइनों के पास स्थित खेती वाली भूमि से घिरे हुए अलग-थलग पड़े गांव पठार के प्रमुख हिस्से पर आधिकार रखते हैं।

पहाड़ियों के उत्तरी और पश्चिमी ओर के जंगल लगभग शुद्ध साल और अन्य प्रजातियों से घिरे हुए हैं|

चूंकि खनिज संसाधनों के आसान समुपयोजन(दोहन) के लिए रेलवे लाइनों और सड़कों को सबसे दूरदराज के हिस्सों में ले जाया गया है, इसके कारण कई रेलवे स्टेशन और उपनगर उत्पन्न हुए हैं, जिनके आस-पास वनों की बहुत अधिक कटाई और चराई हुई है। ऐसे क्षेत्रों में कोम्बेट्रम डेकनड्रम, बबूल, बांस, नीम, कुरुची, तालिस्पत्री, धातकी, खजूर हैं, और लाइगोडियम प्रजातियां और राईमुनिया, क्रोटन स्पर्सिफ्लोर, अमलतास प्रजातियां और जंगली तुळस किनारों के पास देखे जाते हैं|

धालभूम क्षेत्र में जंगल मुख्य रूप से पहाड़ की चोटियों (पर्वत पृष्ठ) पर और लहरदार दिखती घाटियों में हैं और मुख्य रूप से सुरक्षित और संरक्षित हैं। जंगल बहुत घने होते हैं और इसमे लंबे पेड़ हैं, सदाबहार और पर्णपाती वृक्ष दोनों साथ-साथ खड़े हैं और कई अमरबेल,ऑर्किड और अन्य परोपजीवी और पेड़ों के नीचे उगने वाले घने झाड़ को आश्रय देते हैं। इन पेड़ों का उल्लेख पहले किया हुआ है। कुछ पहाड़ियों के शिखर खनिजों के दोहन के कारण बंजर हो चुके हैं।

घाटशिला-चकुलिया क्षेत्र, रेलवे लाइन और सड़क के किनारे एक अपेक्षाकृत सामान स्तर वाला क्षेत्र है जहां की ज्यादातर जमीन को खेती के अंतर्गत लाया गया है और महुआ, सहिजन, नीम, बरगद, पीपल, खजूर, आम, इमली, पपीता, कटहल और बेर जैसे गांवों के लिए महत्व के पेड़ देखे जाते है। पहाड़ी की तरफ, इन क्षेत्रों में जंगल मौजूद हैं लेकिन वे बहुत लंबे समय तक बहुत शोषित हुए हैं और अब जंगल दयनीय स्थिति में हैं|

उत्तर कोल्हान क्षेत्र और दक्षिण पोराहाट क्षेत्र – जहां तक ​​वनस्पति का संबंध है, यहां की स्थिति खराब है। बहुत कटाई और छोटी झाड़ियों की समाप्ति की गयी है। पहाड़ियों की ढलानों पर साल,गार्डनिया प्रजाति(पापडा), चमग्गाई, झाड़ खजूर, कुंभी, करमल, असन हररा, कुसुम और विजयसार(बीजपत्ता) देखे जाते हैं| समतल भूमि पर कुछ सलाई, धोरा, गरारी, मोहिन, कुलू, गलगल, बांस एवं खजूर देखे जाते हैं| स्वयं प्रस्तावित औषधीय पौधे जैसे कि घोड़ा तुलसी(मीठी पत्ती), जंगली पुदीना ,भंडीरा(भांट) भी देखे जाते हैं|

पर्वत श्रंखला आनंदपुर और बांदागांव के बीच उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित है – यहाँ लगभग 1500 फीट की तीव्र ढलान है, रांची पहुँचने के लिए यह पर्वत श्रंखला एक घाटी द्वारा क्रॉस की जाती है। घाटी का क्षेत्र संरक्षित जंगल से ढका हुआ है। दक्षिण मुखी होने के कारण जंगल बहुत घना नहीं है और प्रजातियां ज्यादातर मरुद्भिदी(सूखा चाहने वाली)हैं।

साल के पेड़ मौजूद है लेकिन ये बहुत लंबे नहीं हैं और पास-पास नहीं हैं। यह कहीं-कहीं कई सफ़ेद छाल वाले पेड़ों (कुलू) के साथ हैं और कहीं कुछ महुआ, पीपल, सेमल, पलास, आम और बरंग(पुलिया) भी हैं जो चड़ने वाली लताओं जैसे कि आसन, बहाहकन्द, स्माइलैक्स प्रजातियों और विटिस प्रजातियों के साथ हैं। झाड़ में अमला, धवई, इंडिगोफेरा पुल्चेला और लंबी घास हैं|

जिले के रोचक पौधे

अनावृतबीजी, नेटम स्कैंडेंस इस जिले में घाटी में पाए जाते हैं। यद्यपि तनारहित पाम, झाड़- खजूर छोटानागपुर और पलामू पठार पर प्रचुर मात्रा में देखा जाता है। विशेष रूप से टाटानगर के दक्षिण में हरे धागे जैसे कैसिथा फिलिफोर्मिस परजीवी, लोरंथस की सैकड़ों प्रजातियां और कई एपिफाइटिक ऑर्किड यहां देखे जाते हैं। स्टेरकुला यूरियन और बोसवेलिया सेरेटा के गठावदार सफेद तने वाले पेड़ काले चट्टानों की पृष्ठभूमि में सुस्पष्ट हैं|

वनस्पतियां

ये जंगल पूरे जिले में बिखरे हुए हैं, लेकिन दक्षिण-पश्चिमी हिस्सों में बहुतअधिक मात्रा में हैं, जहां यह बिना अंतराल के एक लंबे हिस्से में हैं जो तीव्र ढलान वाली चट्टानी पहाड़ियों और बीच में आने वाली घाटियों को आच्छादित करती हैं। इस प्रकार की स्थलाकृति व्यवस्था प्रकृति और वनस्पति के प्रकारों जो कि बहुत सूखे, बुरी तरह से नष्ट हो चुके चट्टानों पर पाये जाने वाले सूखे-काटेदार से लेकर आश्रयदाई नम घाटियों में अर्ध-सदाबहार प्रकार तक विभाजन में एक निर्धारित कारक बन जाती है। लेकिन इन दो चरम प्रकारों के अलावा, सत्तारूढ़ वनस्पति नम उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन है जो खुले दक्षिणी किनारों एवं पर्वत-स्कंधों पर शुष्क पर्णपाती हो जाती है।

पशुवर्ग

हाथी अक्सर इस जिले के जंगलों में मिल जाते हैं और इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। जिले के उत्तर में दलमा रेंज पर जंगलों में जंगली हाथी का पाया जाना आम बात हैं। भारी क्षति बारिश में मुख्य रूप से खेती, नए उगे बांस के झुरमुटो और पुनर्जन्म क्षेत्रों में होती है। वर्ष की सूखी अवधि में वे खुद को नम घाटियों तक सीमित रखते हैं। जंगली साँड मौजूद हैं लेकिन अधिक आंतरिक इलाकों के अलावा बारिश में जब वे खुले इलाकों में घूमते हुए देखे जाते हैं| ससंगदा पठार की करम्पदा ब्लॉक का इस विषय में उल्लेख किया जा सकता है जहाँ बारिश के अंत में सभी प्रकार के जानवर घूमते हुए देखे जा सकते हैं|

बाघ और तेंदुआ मौजूद हैं लेकिन उनका दिखना बहुत दुर्लभ हैं। किसी समय पर जब वे गांव के मवेशियों और भटकने वाली स्थिति में मनुष्यों पर हमला करते हैं। भालू बड़ी संख्या में मौजूद होते हैं और कभी-कभी मानव पर हमला करते हैं और फसलों और फलों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। सूअर काफी बड़ी संख्या में मौजूद हैं और खेती को नुकसान पहुंचाते हैं। जंगली कुत्तों को अक्सर देखा जाता है|

सांभर और हिरण की संख्या में धीमी कमी के अनेक कारण हैं। जंगलों के घना व विस्तृत ना होने के कारण प्रजनन में कमी आई हैं। होउ अगर उसे मौका मिलता है तो अपने धनुष और तीर और शिकार के महान शौक के साथ हिरण को मारने में विफल नहीं होगा। रात में मोटर कारों से स्पॉटलाइट की मदद से शूटिंग का अभ्यास, हालांकि यह निषिद्ध है, अभी भी प्रचलित है और शिकार की कमी का ये एक और कारण है।